(हिंदी के जाने-माने कथाकार जयशंकर के अब तक चार कहानी-संग्रह छप चुके हैं. मरुस्थल नामक उनका संग्रह अत्यंत चर्चित रहा था और बारिश, इश्वर तथा मृत्यु शीर्षक उनका नवीनतम संग्रह बिना किसी हो-हल्ले के हिंदी का बेस्ट-सेलर है, मेरे जाने पिछले पांच वर्ष में आया सबसे अच्छा कहानी-संग्रह भी. जयशंकर आमला जैसी छोटी जगह में रहकर लिखते हैं, यह लेखक-परिचय पढने में दिलचस्पी रखने के अलावा शायद ही कोई जानता हो. स्वयं जयशंकर के संज्ञान में लेखक संगठन या गुट वगैरह नहीं, उनसे सम्बन्ध तो दूर की बात है. ऐसे लेखकों के प्रति मन में एक सम्मान का भाव जगता है. जयशंकर ने कहानियों के अलावा समय-समय पर पत्रिकाओं में अपने जर्नल्स भी प्रकाशित कराये हैं. यह बही-खाता उनमें से ही कुछ वाक्यों का थीमैटिक चयन है. यों बही-खाता स्तंभ की यह नौवीं प्रस्तुति है. बाद में जयशंकर के जर्नल्स की दूसरी झलकियाँ भी पेश की जाएंगी. )
लिखने के बारे में लिख नहीं पाने की अपनी हार और हताशा, शर्म और पीड़ा से मुंह चुराने के लिए आप अपने रैक से कोई पुस्तक निकालकर पढ़ना शुरू करते हैं। अगर आपके दुर्भाग्य से वह किताब सचमुच की किताब रही तब पढ़ते हुए भी आपकी अपनी व्यथा का विस्तार होता रहता है, आपका अवसाद आकार लेता रहता है।
जीवन में जो अनुभव दुःख देते हैं, जिनके साथ रह पाना असहनीय हो जाता है, उन्हीं अनुभवों को किसी परिपक्व , प्रौढ़ कलाकृति में पढ़ते या देखते हुए गहरी तसल्ली मिलती है।
किसी भी लेखक के भीतर अधूरी आकांक्षाओं के कितने ही प्रेत बसते होंगे। शायद हर लेखक जिस चीज़ के अभाव को अपनी ज़िन्दगी में पाता होगा, उस चीज़ को अपनी कृति में पाना चाहता होगा।...हर सच्चा लेखक और कलाकार अपनी तरह से अपनी परिस्थिति, मनःस्थिति और अपनी कृति के बीच संतुलन पैदा करने में सफल होता है।
वैसे तो लिखने का कोई निश्चित नियम कैसे निर्धारित किया जा सकता है ? पर मन में यह संशय उठता रहता है कि लिखने के कर्म की मर्यादाएं न रहें तो यह कर्म एक अराजक कर्म भी हो सकता है।...हजारों बर्षों की सृजनात्मक चेष्टाओं के आलोक में अपनी रचनात्मक असफलताओं, कल्पना की कमजोरियों और अभिव्यक्ति की गरीबी को देखा जा सकता है।
हम अपने जीवन के किसी आत्मीय हिस्से में बस जाना चाहते हैं, छिप जाना चाहते हैं, रुक जाना चाहते हैं, लेकिन समय की सनक के सामने हम विवश हो जाते हैं। अपने जीवन के उस मार्मिक प्रसंग को भुलाने की तमन्ना के साथ हम उस प्रसंग को अपनी कहानियों-कविताओं में जगह देने की सफल-असफल कोशिश करते हैं। जीने के वक्त की उत्तेजना, अपने लिखे हुए में बहुत कम नज़र आती है। कल्पना, अभिव्यक्ति और रचना की असफलताओं से निरंतर संघर्ष और संवाद में ही किसी लेखक को तसल्ली का, निष्ठां का, उम्मीद का कोई अज्ञात ज़ोन नज़र आता होगा। शायद हर लेखक तारकोवस्की की फ़िल्म 'stalker' के नायक की तरह एक अज्ञात ज़ोन में जाने का खतरा उठता होगा।
मैं पिछले तीन बरसों से धीरे-धीरे, डरते-डरते, रोते-थकते हुए उपन्यास लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। अभी तक तो कुछ भी हाथ नहीं आया है। न भाषा, न पात्र, न परिवेश और न ही कोई नई बात या संवेदना। मैं सिर्फ़ लिखता चला जाता हूँ और थकता चला जाता हूँ। कभी-कभी घनी निराशा और हताशा के क्षण आते हैं जब मैं महसूस करता हूँ कि लिखते-लिखते नौ-दस बरस होने को आए हैं और मैं एक अच्छा, जीवंत और सच्चा वाक्य लिख पाने के भी काबिल नहीं बन पाया हूँ। तब यह भी महसूस होता है कि मुझे अपनी लिखने की लालसा और आकांक्षा के बारे में, कभी अपने लेखक हो जाने के स्वप्न के विषय में एक और बार सोचना चाहिए।
जब कोई लिखना चाह रहा हो तो उसके लिए मरे हुए वाक्य से ज्यादा मृत क्या चीज़ हो सकती है?
जब कोई लिखना चाह रहा हो तो उसके लिए मरे हुए वाक्य से ज्यादा मृत क्या चीज़ हो सकती है?
अपने लिखे हुए में कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए, अपनी कृतियों की निजी, विशिष्ट और जीवंत दुनिया होनी चाहिए।...ऐसा कुछ भी लिख सकूँ इसके लिए मुझे साधना करनी चाहिए, प्रतीक्षा करनीचाहिए और मैं अभी तक इन दोनों ही चीज़ों से अपना सहज रिश्ता नहीं बना पाया हूँ. ये दोनों ही चीजें मेरे लिए सिर्फ शब्द हैं।
****
****